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Tuesday, June 25, 2024

हिंदी का अमृत महोत्सव आना अभी बाकी है!

डॉ गोपाल जी राय

हिंदी भाषा का यह संघर्ष काल है। क्योंकि यह भाषा राष्ट्र भाषा बने, इसको लेकर भारत के अन्य भाषा भाषी ही गर्म हैं। विदेशी भाषा अंग्रेजी और विदेशी भाषी अंग्रेजों की कुत्सित चाल भी है यह, इसलिए हिंदी भाषा का अमृत महोत्सव आना अभी बाकी है! हालांकि, हिंदी भाषा साहित्य में अमृत का समृद्ध वर्णन उपलब्ध है। इसलिए हिंदी प्रेमी यदि सजग रहे तो अमृत महोत्सव आते देर नहीं लगेगी। खासकर मौजूदा सरकार के रहते। यह पहली सरकार है जिसने राजकाज की भाषा में हिंदी को प्रथम वरीयता दी है, द्वितीय नहीं! हां, हिंदी से जिन्हें सौतिया डाह है, उनको इस स्थिति से निजात दिलाने में तो वक्त लगेगा ही।

निःसंदेह, हिंदी वह भारतीय भाषा है जो उसकी सबसे बड़ी आबादी द्वारा बोली जाती है। इसकी जड़ देवभाषा संस्कृत और उसकी लिपि देवनागरी से जुड़ी हुई है। यह राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पाई, यह विचारणीय पहलू है। यक्ष प्रश्न यह है कि भले ही उसे भारत में राजभाषा का दर्जा दे दिया गया हो, 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिंदी दिवस पर देश- विदेश में व्यापक आयोजन होता हो, फिर भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने जैसे अहम सवाल पर जिम्मेदार लोग अक्सर चुप्पी साध लेते हैं, या फिर इधर उधर की अप्रासंगिक दलीलें देते हैं, जो अनुचित है। यह कड़वी सच्चाई है कि हिंदी को जितना दबाया गया, उतनी ही वह ऊपर उठती चली गई। उसने भाषाई रजत ,स्वर्ण सभी समारोह मना लिए, बस अमृत महोत्सव आना बाकी है।

यह कितनी अजीबोगरीब बात है कि अंग्रेजी मानसिकता वाले लोग भारत में ही उसकी सबसे बड़ी जनभाषा हिंदी को दबाने के लिए क्षेत्रीय भाषा-भाषियों से इसकी होड़ मचवाते हैं और क्षेत्रीय नेताओं व लोगों को हिंदी के खिलाफ भड़काते हैं। इसे राजनैतिक मुद्दा बनवाते हैं, जिससे बचे जाने अन्यथा केंद्र सरकार द्वारा ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करवाने की जरूरत है। क्योंकि ऐसे लोगों की अवांछित गतिविधियों से कहीं न कहीं राष्ट्रीय एकता व अखंडता पर नकारात्मक असर पड़ता है।

सुकून की बात यह है कि जाने-अनजाने हिंदी का प्रचार प्रसार न केवल गैर हिंदी भाषी राज्यों में बढ़ रहा है, बल्कि विदेशों में भी इसकी पूछ में इजाफा हो रहा है। ऐसा इसलिए कि दुनिया में भारत एक महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर है। इसका स्पष्ट असर हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता पर भी दिखाई दे रहा है। वाकई जिस तरह से दुनिया भर के देशों में हिंदी का प्रचार-प्रसार बढ़ा है, भारत को समझने-समझाने के लिए हिंदी के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, उसके लिहाज से हिंदी सीखना विदेशियों के लिए एक जरूरत बनता जा रहा है।

विदेशी भाषा-भाषियों द्वारा हिंदी सीखने की ललक से गैर हिंदी भाषी राज्यों के युवाओं पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ रहा है। यही वजह है कि हिंदी के विस्तार को थामने के लिए अंग्रेजी भाषा-भाषी लोगों ने भारत के क्षेत्रीय भाषाओं खासकर दक्षिण भारतीय भाषाओं से जो इसकी होड़ लगवाई, अब उन्हें निराशा हाथ लगी है। क्योंकि भारत एक बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में उभर रहा है। इसमें हिंदी भाषा के योगदान से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।

जानकारों के मुताबिक, भारत में हो रहे आर्थिक विकास का असर हिंदी के विकास के रूप में भी विदेशों में दिख रहा है। जैसे-जैसे विदेशों की कंपनियां भारत में लोकप्रिय हो रही हैं, वैसे-वैसे हिंदी के प्रति भी वहां के लोगों का झुकाव बढ़ रहा है। उदाहरणतया, दक्षिण कोरिया जैसे देश में में रहने वाले युवा तो भारत में लोकप्रिय हुंडई व सैमसंग जैसी कंपनियों में काम करने के लिए हिंदी जानने-समझने की पहल की है।

इसी तरह भारत के मित्र देशों के युवाओं ने भी हिंदी के प्रति अपनी रुचि बढ़ाई है, ताकि दोनों देशों के पारस्परिक सम्बन्धों को और मजबूती मिले। इसके लिए उनकी सरकारें भी उन्हें प्रोत्साहित करती रहती हैं। यदि सिंगापुर की सरकार की नीतियों की बात करें, तो यह मानना पड़ेगा कि उनकी नीतियों की वजह से ही यहां हिंदी का प्रचार-प्रसार बहुत हुआ है।

कहना न होगा कि हिंदी के क्षेत्रीय व वैश्विक विस्तार में हिंदी फिल्मों का भी बहुत बड़ा योगदान है। भारतीय इतिहास, संस्कृति, अध्यात्म, लोक परंपरा, ज्ञान-विज्ञान और रीति-रिवाज और जनतांत्रिक प्रशासन के जिन विभिन्न पहलुओं को इन फिल्मों में दर्शाया गया है, उससे विदेशों में हिंदी का प्रसार प्रसार प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से होता गया। आप यह जानकर हैरत में पड़ जाएंगे कि 3 इडियट और दंगल जैसी हिट हिंदी फिल्में न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में भी काफी लोकप्रियता पाई थीं। यह तो महज बानगी है, विस्तार से बताने को बहुत कुछ है। आलम यह है कि विदेशों में वहां की प्रचलित भाषा के सबटाइटल के साथ हिंदी फिल्में लगाई जाती हैं।

देखा जाए तो बॉलीवुड ने भी हिंदी का प्रचार किया है। दिलचस्प यह है कि ऑस्ट्रेलिया में कोई हिंदी फिल्मों में काम करने के लिए हिंदी सीखना चाहता है, तो कोई योगा को समझने के लिए, और तो और, कोई भारत को ही समझने के लिए हिंदी सीखना चाहता है। क्योंकि उन्हें लगता है कि यदि भारत को जानना हो तो हिंदी आनी ही चाहिए। वहां का एक लड़का गोवा में रिजॉर्ट खोलना चाहता था, इसलिए हिंदी सीख रहा था। इसलिए इस बात में कोई शक नहीं कि विदेशों में हिंदी के विकास का श्रेय भारतीय फिल्मों को भी जाता है।

विदेशों में युवा अपनी मां की प्रेरणा से भी हिंदी सीखते पाए जाते हैं, क्योंकि अंतरजातीय व अंतर्धार्मिक विवाह के बढ़ते प्रचलन से लाखों भारतीय युवतियों ने विदेशियों से वैवाहिक संबंध स्थापित किये और अपने सगे-सम्बन्धियों और बच्चों को हिंदी भी सीखने के लिये उत्प्रेरित किया है और कर रही हैं। उनकी स्पष्ट सोच रहती है कि विदेशों की स्थानीय संस्कृति के प्रति आपके मन में सम्मान का भाव हो, उसे जानने समझने की आपकी, आपके मन में जिज्ञासा हो। लेकिन यदि हम अपनी स्वयं की संस्कृति के प्रति सम्मान का भाव नहीं रखेंगे तो कोई हमारे प्रति सम्मान का भाव नहीं रखेगा। आपकी सारी पहचान अपनी भाषा-संस्कृति को बचाये व बढ़ाए रखने में ही है, यह बात प्रबुद्ध लोग भी जानते समझते हैं।

यदि हम फिजी में हिंदी भाषा की शुरुआत संपर्क भाषा के रूप में होने की बात करें तो वहां इसकी शुरुआत तब हुई जब लगभग 142 वर्ष पहले भारत से लोग गिरमिटिया मजदूर बनकर वहां गए और अपनी हिंदी व इससे मिलती जुलती भाषा को वहां प्रचलित किया। अब वहां के नागरिक बन चुके अप्रवासी भारतीय गर्व से कहते हैं कि फिजी आये हमारे पूर्वजों के चलते हिंदी हमारे डीएनए में है। विचारों से वहां के प्रवासी भारतीय पीढ़ी दर पीढ़ी हिंदी को प्रोत्साहन दे रहे हैं। वहां के प्राथमिक विद्यालयों में हिंदी अनिवार्य भाषा है, लेकिन माध्यमिक विद्यालयों में वैकल्पिक भाषा होने की वजह से ही यह छूट रही है।

अगर हम ऑस्ट्रेलिया की बात करें तो हिंदी के कुछ शब्द वहां पर बहुत ही प्रचलित हैं। जैसे आप ऑस्ट्रेलिया के किसी रेस्टोरेंट में जाएंगे तो आपको चाय; लिखी हुई मिलेगी, चाय को टी वहां कोई नहीं बोलता। इस बात में कोई दो राय नहीं कि भारत वहां बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसका असर दुनिया में भी दिख रहा है। दिल्ली में ऑस्ट्रेलिया के दूतावास में हिंदी बोलने वालों को प्राथमिकता मिलती है। इससे साफ है कि बहुत बढ़ते व्यापारिक संबंधों के कारण भी दुनिया में हिंदी आगे बढ़ी है। निर्विवाद रूप से जाने अनजाने में हिंदी को जितना दबाया गया, वह उतनी ही ऊपर उठती गई। भारत से निकल कर पूरी दुनिया में फैल गई। इसलिए उम्मीद रखिए, हिंदी भाषा का अमृत महोत्सव भी जल्द ही आने वाला है ।

 

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